Friday, December 10, 2010
.. .<मधु का प्याला>. .. कभी-कभी तो, . . . एक हवा का शीतल झौका, . . . किसी सुबह तो, . . . तुम्हें जगाता होगा? . . . और चांद की शीतल किरणें, . . . कभी-कभी तो, लोरी गाकर, . . . तुम्हें सुलाती होंगी? . . . घोर निशा के निविड़ तिमिर में, . . . टिम टीम तारे, . . . कभी देख तो पाते होगे! . . . प्रिय की मुस्कानों का जादू, . . . कभी हृदय पर चलता तो होगा? . . . मेरे देखे-आज कहूं मैं, . . . वहीं कहीं पर राज छिपा है- . . . वहीं कहीं पर होश छिपा है- . . . बाकी तो सब बेहोशी है। . . . बुद्धि के प्रपंच निराले, . . . ग्यानी भटके-मूरख पहुंचे, . . . पी पी कर मधु का प्याला। . . . जब दिल से कोई हूक उठे-या, . . . उस पर कोई ठोकर आए, . . . बुद्धि सिमट कर एक तरफ जब, . . . दूर खड़ी हो जाए, . . . तभी जागना, . . . नहीं चूकना तब यदि, . . . छलके मधु का प्याला, . . . हो जाना पी पी कर मतवाला। . . . . . . . . . . . . (दिनेश पाण्डेय)
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