Saturday, November 27, 2010

. . . . . . .¤तुम खुद मेरी गजल बनो¤ . . . . . . . . . मेरी कवीता का अर्थ न पूछो, . . .¤ उसमें अर्थ कहां है? . . .¤ मेरे गीतों के बोल अनूठे! . . . ¤ उनमें व्यर्थ न उलझो। . . . ¤ मेरी कविता के साथ बहो, . . . ¤ और मेरे गीतो में झूमो। . . . ¤ हो साहस तो करो नृत्य, . . . ¤ अपने आपा को भूलो। . . . ¤ मेरी गजलें तो दीवानी हैं, . . . ¤ इनमें क्या हासिल है? . . . ¤ न मानो तो मेरी गजलों के, . . . ¤ दीवानों से पूझो। . . . ¤ कहां-कहां तुम गागर लेकर, . . . ¤ जल भरने को घूमे? . . . ¤ पर रीती ही रही हमेशा, . . . ¤ जब देखी आकर के घर में। . . . ¤ कितनी क्रांति हुई है जग में? . . . ¤ कितने राज्य बने मिटे हैं? . . . ¤ उनका कोई अर्थ बताओ? . . . ¤ आखिर सब वे दफनाई हुई स्मृतियां है। . . . ¤तुम संजीदे लोग गजब हो, . . . ¤ दीवानों की हँसी उड़ाते, . . . ¤खुद रोते दुख सहते, . . . ¤ साथ कभी कुछ क्या ले जा पाते? . . . ¤ बुद्धि की घानी में अब तक, . . . ¤ कितना क्या कुछ पेर चुके हो? . . . ¤ किंतु लगा क्या हाथ अभी तक, . . . ¤ अनजाने का विस्तार कहां तक? . . . ¤ छोड़ो दिमाग की बात, . . . ¤ यहां तो बात करो तुम दिल की, . . . ¤ मेरी कविता के साथ बहो, . . . ¤ और मेरे गीतों में झूमो। . . . ¤ तुम खुद पेरी गजल बनो, . . . ¤ उसका अर्थ न पूछो। . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . (दिनेश पाण्डेय)

3 comments:

  1. एक पल का जादू

    दिल की 'और डांस
    कविता की लय
    जहां सब कुछ पल है
    जादू श्वास
    जहाँ दूसरों को शामिल नहीं

    और 'सपना और हकीकत
    जीवन का एक जाल में
    एक साथ आकाश में हाथ की तरह
    और लंबी अवधि
    इस अनंत प्यार की

    2011/12/12 Poetyca

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  2. एक लम्बी अवधि इस अनंत प्यार की. . .

    so nice!!
    peace & harmoney to you.

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  3. बहुत समय से प्रतीक्षा आप के भावाभिव्यक्ति पटल तक पहुँचने की। आज इसे पढ़ अच्छा लगा।

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